वास्तु शास्त्र होटल/ रेस्टोरेंट

वास्तु शास्त्र होटल/ रेस्टोरेंट

सामान्य चायपान गृह, खानेपीने की जगह, ढाबा व साधारण लॉज , इस प्रकार के होटल्स अत्यावश्यक प्रकार के माने जाते हैं। इसीलिए उनके प्रवेशद्वार पांच मुख्य प्रवेशद्वारों में से एक होना चाहिए, खास करके उत्तर से पूर्व भाग में होना अधिक अच्छा होता है। अन्य सभी प्रकार के होटल्सफैमिली रेस्टोरेंट, बारपरमिट रूम, तीन, पांच, सात सितारा होटलों, ये सभी मौजमजा वाले होते हैं, इसलिए इनके प्रवेशद्वार दक्षिण अथवा नैऋत्य दिशा में लेना अधिक अच्छा होता है।

ईशान भाग में रिशेप्शन, सूचना कक्ष, अभ्यागतो के बैठने की व्यवस्था, ओपन पैसेज, खुली जगह, स्विमिंग पूल, अंडरग्राउंड वॉटर टैंक, कैफेटेरिया, गार्डन रेस्टोरेंट, ओपन लॉन, स्पेशल रूम, विशेष भव्य सूट्स, जहां अधिक खुलापन व कम वजन होना चाहिए। लिफ्ट की व्यवस्था भी हो सकती हैं। आग्नेय भाग में मुख्यत: किचन, एअरकंडीशनिंग व्यवस्था, इलेक्ट्रिक मेनस्विच, ट्रांसफार्मर, हिटर्स, गिजर्स, बॉयलर्स, गैस सिलिंडर रखने की व्यवस्था, बहुमंज़िली होटल्स के प्रत्येक मजले पर छोटा सर्विस किचन अथवा पैंट्री स्टाफ कैटरर्स तथा आवश्यक हो तो पार्किंग व स्टोरेज की व्यवस्था करना इस भाग में अच्छा होता है। नैऋत्य भाग में कस्टमर सर्विस से लेकर मुख्य अधिकारी कार्यालय तक , प्रशासन यंत्रणा कार्यालय, अधिक से अधिक स्टोरेज, अधिकाधिक रूम्स व उनमें अधिक ग्राहक समाविष्ट करने की व्यवस्थाएं आदि चीजों का समावेश इसी दिशा में करना आवश्यक होता है। वायव्य दिशा में साफ सफाई व्यवस्था, रूम सर्विस विभाग, टॉयलेट ब्लोक्स, टेलीफोन व अन्य संपर्क व्यवस्था, स्टोरेज, कॉन्फरेंस होल्स, बुफे, अथवा बैंक्वेट हॉल, लॉन्ड्री, इनके जैसी विभिन्न चीजों का समावेश विभिन्न मंज़िलो पर जगह की उपलब्धि के अनुसार करनी चाहिए।

होटल व्यवसाय में जो विविध सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजनाएं होती हैं उन सभी की रचना वास्तुशास्त्र अनुसार निश्चित की जा सकती हैं। उसके लिए सुविधाओ के प्रकार व उनका पंचमहाभूतों में से कोन से तत्व के साथ अधिक संबंध है उसके अनुसार उनके स्थान निश्चित किए जाते हैं। मुख्य parking सुविधा वायव्य भाग में करनी चाहिए।

Personality of the Numbers

Personality of numbers 1 to 9 represent human characteristics.

Both single and double digit numbers signify characteristics.

A brief of such characteristics are as below:

Single digit Numbers:

*No:1*- Most independent, Unconventional, Individualistic of all numbers.

Represents the beginning. Source, Innovator etc.,

*No:2*- Gentle; represents co-operation; diplomacy; Tactful; Power behind the

throne; Supportive number

*No:3*- Most playful; creative, inspirational, motivating, Self-expression and

Communication; Happy-to-go lucky number; Optimistic and enthusiastic;

*No:4*- Most practical. Sharp eye for details; orderly, systematic, methodical

and precise. Reliable, dependable; Rigid and dislikes changes;

*No:5*- Most dynamic. Persuasive, a promoter, Versatile, adaptable,

experimenter and explorer, straight-shooter with extraordinary reflexes; adventurous and

courageous;

*No:6*- Most loving; harmonious with all numbers; committed; caring;

sympathetic; protective as well as responsible; cares for weaker – mother/fatherhood number.

*No:7*- Most spiritual – seeker of truth; mental; analytical; meditative; self-oriented and often

withdrawn; scientist, philosopher, preacher, scholar and sage.

*No:8*- Most result oriented; balance between material and spiritual world; powerful;

ambitious; big dreams; big plans; gambler; forgiving, broad minded; visionary number.

*No:9*- Most humanitarian- effort and sacrifice; giving, sharing, loving; caring;

world-wide consciousness; genius; synthesizer; creative and artistic; aloof, noble, aristocratic.

अंक ३ की असर…

जो जातक का जन्म किसी भी मास की ३, १२, २१, या ३० तारीख को हुआ हो उन सभी लोगों पर अंक ३ की असर देखने को मिलती है।

और उसमें भी विशेष रूप से २१ नवम्बर से २० दिसम्बर / २० फरवरी से २० मार्च तक जन्म हुआ है तो उसके उपर अंक ३ और गुरु ग्रह की असर दिखाई देती है। अंक ३ का प्रतिनिधित्व ग्रह गुरु है।

अंक ३ शिक्षा,  संस्कार,  व्यवस्था,  धर्म,  ज्ञान,  न्याय,  महत्वाकांक्षा,  कर्तव्य दर्शाता है। जातक आत्मविश्वासी और महत्वकांक्षी होता है। स्वयं शिस्त में रहते हैं और सभी शिस्त में रहे वही चाहता है। उसकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति उच्च प्रकार की होती हैं।

अंक ३ वाले को जिवन में संघर्ष करना पड़ता है। वे विवेकपूर्ण, शांत और गंभीर होते हैं। स्त्रियाँ प्रमाणिक और रूढ़िवादी होती है।

निषेधात्मक रूप से ३ अंक वाले लोगों में निंदा करने की वृत्ति और स्त्रियाँ में संकुचितता और टक टक करने की आदत होती है।

अंक ३ वालो के लिए शुभ तारीख ३, १२,  २१, ३० है।

गुरुवार उनके लिए शुभ है और पीला,  गुलाबी रंग शुभ रंग है।

उन को पेट के रोग,  कफ, स्नायु की पीड़ा और मेद रोग होने की संभावना है या तो देखने को मिल सकता है। अंक ३ का शत्रु अंक ५ और मित्र अंक ३, ६, ९, २, ८ है।

जनवरी और जुलाई ये मास उनके लिए कमजोर समय है और भाग्योदय वर्ष २१ और २७ है। शुभ धातु सुवर्ण (gold) हैं। (AstroAgile)

 

 

राशि तुल्य नवमांश और नवमांश तुल्य राशि

जो कोई ग्रह जिस नवमांश में होता है तो वह नवमांश की जो राशि होती है वह राशि में ग्रह की राशि आती हो तो ग्रह की नवमांश तुल्य राशि में ग्रह का राशि तुल्य नवमांश हैं।

कोई कुंडली में सूर्य कुंभ राशि में और मिथुन नवमांश में हैं। यहां ग्रह कुंभ राशि में और मिथुन नवमांश में हैं। मिथुन राशि में कुंभ नवमांश आता है। इसलिए ग्रह राशि तुल्य नवमांश और नवमांश तुल्य राशि में हैं ऐसा कहा जाता हैं।

जब गोचर में सूर्य मिथुन राशि में और कुंभ नवमांश में आएगा तब वह अपने कारकत्व अनुसार और अपने अधिपति का फल देगा।

जल तत्व की राशि (४,८,१२) में मेष, वृषभ, मिथुन ये राशियों नवमांश तुल्य राशि में राशि तुल्य नवमांश में नहीं आएगा।

वायु तत्व की राशि (३,७,११) में कर्क, सिंह, कन्या ये राशियों नवमांश तुल्य राशि में राशि तुल्य नवमांश में नहीं आएगा।

पृथ्वी तत्व की राशि (२,६,१०) में तुला, वृश्चिक, धनु ये राशियों नवमांश तुल्य राशि में राशि तुल्य नवमांश में नहीं आएगा।

अग्नि तत्व की राशि (१,५,९) में मकर, कुंभ, मीन ये राशियों नवमांश तुल्य राशि में राशि तुल्य नवमांश में नहीं आएगा।

ग्रह को अपनी नवमांश तुल्य राशि में अधिक बिंदु मिल रहा हो तो ग्रह अधिक बलवान बनता हैं।

शनि जिस नवमांश में से निकल रहा है वह नवमांश तुल्य राशि आपकी जन्म कुंडली में जिस भाव में हो उस भाव संबंधित कष्ट होता है। वहाँ पर २५ से कम बिंदु हो तो अवश्य तकलीफ देता हैं।

नेहा शाह।

भावसिद्घिकाल

भाव सम्बन्धी फल कब होगा ?

(१) भावेश जिस राशि और अंश में हो उस से त्रिकोण में गोचरवश जब लग्नेश आवे।

(२) लग्नेश जिस राशि में या उससे और अंश में है उसमें या उससे त्रिकोण में जब गोचरवश भावेश आवे।

(३) जब लग्नेश और भावेश गोचरवश एक दूसरे को देखें या एक दूसरे से युक्त हो जाये।

(४) जब भाव कारक गोचरवश उस स्थान पर आवे जहाँ जन्म कुण्डली में लग्नेश वा चन्द्र राशि का स्वामी हो।

(५) जब लग्नेश गोचरवश उस भाव में आवे – – जिस भाव सम्बन्धी विचार करना हो।

चन्द्र लग्न से भी इसी प्रकार विचार करना चाहिए।

जिस भाव का विचार करना है उसका स्वामी किस राशि और किस अंश में है, जब गोचरवश बृहस्पति उस राशि और अंश के त्रिकोण में आता है तब उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होता है। जब गोचरवश लग्नेश और षष्ठेश का योग हो तो, लग्नेश की बजाय षष्ठेश दुर्बल हो तो जातक के वश में शत्रु आ जाता है और यदि लग्नेश की बजाय षष्ठेश बली हो तो जातक स्वयं शत्रु के वश हो जाता है।

जिस भावेश की और लग्नेश की तात्कालिक या नैसर्गिक या एक – दूसरे से षष्ठ – अष्टम रहने के कारण शत्रुता हो – – – –  उन दोनों का लग्नेश और उस भावेश का जब गोचरवश योग हो तो उस भाव सम्बन्धी शत्रुता या स्पर्धा या कलह का कारण होता है। किन्तु यदि लग्नेश और किसी भावेश की नैसर्गिक और तात्कालिक मित्रता हो और लग्नेश तथा उस भावेश का गोचरवश योग हो तो उस भाव सम्बन्धी सुख, नवीन कार्य, मित्रता आदि होता है।

सिंह लग्न की कुण्डली में लग्नेश सूर्य है और षष्ठेश शनि है,  दोनों नैसर्गिक शत्रु भी हैं और कुण्डली में भी तात्कालिक शत्रु है तो जब जब सूर्य – शनि योग होगा तब – तब शत्रु सम्बन्धी त्रास होगा और उसी कुण्डली में सूर्य लग्नेश है तथा बृहस्पति पंचमेश है। दोनों नैसर्गिक मित्र हैं और तात्कालिक मित्र भी हो तो, इस कारण जब जब सूर्य और बृहस्पति का योग होगा तब-तब पंचम भाव सम्बन्धित शुभ फल की प्राप्ति होगी।

कोई जातक मकान या भूमि का प्रश्न करता है कि कब गृह लाभ या भूमि लाभ होगा तो देखिये कि जन्म कुंडली में लग्नेश – चतुर्थेश योग गोचरवश होने वाला है क्या?  जब लग्नेश – चतुर्थेश योग हो तब मकान लाभ या भूमि लाभ होगा। किन्तु यह सम्भव तभी होगा जब चतुर्थेश बलवान हो। भावेश के बलवान होने से ही कार्य सिद्धि होती है। यदि भावेश दुर्बल है तो लग्नेश – भावेश का योग होने पर भी कार्य सिद्धि नहीं होगी। साथ में दशा, अन्तर्दशा का भी विचार कर लेना चाहिए।

जैसे लग्न कुंडली और लग्नेश से कहा गया है उसी प्रकार चन्द्र कुण्डली से ( चन्द्रमा जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर ) विचार करना चाहिए।

नेहा शाह।

कर्क संक्रान्ति

कर्क संक्रान्ति

सूर्य का राशि – परिवर्तन ही संक्रान्ति है। अर्थात् जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि पर पहुँचता है, उसका नाम संक्रान्ति है।
एक वर्ष में एक बार ही एक राशिगत संक्रान्ति होती है और वह एक मास तक रहती है। इसे सौर – मास भी कहते हैं।
आज सूर्य कर्क राशि में १०-१६ को प्रवेश करेगा उसी समय से कर्क संक्रान्ति का प्रारंभ होगा। सूर्य १६ अगस्त तक कर्क राशि में रहेगा तब तक कर्क संक्रान्ति रहेगी।
संक्रान्ति का पुण्यकाल सूर्योदय से १०-१६ तक रहेगा। संक्रान्ति के पुण्यकाल में नमक, पगरखाँ और छाता का दान का महत्व है।

कर्क संक्रान्ति अपने प्रारम्भ के १० दिनों में विशेष प्रभाव दिखाती हैं।
कर्क संक्रान्ति शनिवार को होने से संक्रान्ति का गमन उत्तर दिशा को होता है। संक्रान्ति की द्रष्टि – दिशा ईशान कोण को होगी।

संक्रान्ति प्रवेश के समय जो नक्षत्र होता है, उससे संक्रान्ति के मुहूर्त्ती का ज्ञान होता है। अनुराधा नक्षत्र में कर्क संक्रान्ति प्रवेश कर रही है इसलिए कर्क संक्रान्ति ३० मुहूर्त्ती होगी। ३० मुहूर्त्ती संक्रान्ति में अन्नादि, पशु, तृण व रसादि वस्तुओं के दाम सम रहे, जनता सुखी रहे। परंतु कर्क – संक्रान्ति प्रविष्ट दिन शनिवार होने से दुर्घटना, युद्ध, अनेक उपद्रव से जनता दुखित रहे, वर्षा आदि की कमी से कृषि को क्षति पहुँचे, अन्नादि के भाव बहुत तेज हों तथा सोना, चांदी, तांबादि धातुओं में मंदी आवे।

नेहा शाह.

સંતાન (સંતતિ) યોગો

સંતાન (સંતતિ) યોગો

મધુર દામ્પત્ય જીવનનું સુફળ એટલે સંતાન. સાંતાનયોગો માટે પાંચમો ભાવ જ્યોતિષશાસ્ત્રએ નિર્ણિત કર્યો છે. પંચમ સ્થાન એટલે સંતતિ સ્થાન. સંતાનયોગો માટે પાંચમો ભાવ , પાંચમી સિંહ રાશિ. પંચમ સ્થાનમાં બેઠેલો ગ્રહ , પંચમ સ્થાનને પૂર્ણ દ્રષ્ટિથી અને 3/4 દ્રષ્ટિથી જોતા ગ્રહો, પંચમ સ્થાનનો અધિપતિ અને પંચમ સ્થાનનો કારક ગુરુ એટલાને તપાસવા જોઈએ. પંચમ સ્થાનને અસર કરનારા આ તત્વો શુભ સંબંધિત હોય અને પાપ સંબંધિત ના હોય તો પંચમ સ્થાનનું સુખ સારું મળે અને પંચમ સ્થાન સાથે સંકળાયેલા આ તત્વો અશુભ તત્વો સાથે સંકળાયેલા  હોય તો આ સ્થાન પરત્વે કંઈ ને કંઈ અશુભ ફળ આપે છે. આ જ રીતે ચંદ્ર કુંડળીથી જોતા પણ ખબર પડે છે કે જાતકને સંતાન છે કે નહીં ? છે તો સંતાનો કેવા છે ? સંતાનો ભાગ્યશાળી છે કે નહીં ? અને આ જાતક ને સંતાનોથી સુખ મળશે કે દુઃખ તે તમામ હકીકતો ઝીણામાં ઝીણી વિગતો પ્રાપ્ત થશે. 

સંતતિ થવાના સરળ યોગો :

(1) પંચમેશ શુભ કે પાપગ્રહ હોય પણ પાંચમે બેઠો હોય અને શુભ ગ્રહની દ્રષ્ટિ હોય તો અવશ્ય સંતતિ થાય છે.

(2) પાંચમા ભાવને પાંચમનો અધિપતિ શુભ કે પાપગ્રહ પૂર્ણ દ્રષ્ટિથી જોતો હોય અને બીજા એક શુભ ગ્રહની પાંચમે સ્થિતિ હોય , અગર પૂર્ણ દ્રષ્ટિ હોય તો અવશ્ય સંતતિ થાય છે.

(3) પંચમેશ બળવાન થઈ કેન્દ્ર ત્રિકોણમાં બેઠો હોય તો અને તેને ગુરુ જોતો હોય તો અવશ્ય સંતતિ થાય છે.

(4) પાંચમે સ્વગૃહી કે ઉચ્ચનો કે મૂળ ત્રિકોણનો ગ્રહ બેઠો હોય તો અવશ્ય સંતતિ થાય છે.

(5) પાંચમે શુભગ્રહી ગ્રહની રાશિ હોય અને નવમે દસમે શુભગ્રહો જ હોય તો અવશ્ય સંતતિ થાય છે.

(6) લગ્નનો સ્વામી પાંચમાના અધિપતિ સાથે યોગ કરતો હોય તો અવશ્ય સંતતિ થાય છે.યોગ યુતિ, દ્રષ્ટિ, અને પરસ્પર પરિવર્તનથી થાય છે. 

(7) પાંચમે શુભ રાશિ હોય અને તેના ઉપર શુભ મિત્ર ગ્રહ દ્રષ્ટિ કરતો હોય તો સંતતિ થાય છે.

21st June – Yoga day

21st June – Yoga day…

Try to relate with Numerology

Date

2- Moon – mind – Related with meditation and Chandranamskar

1- Sun – Soul/Body – Related with strength and Suryanamskar

Date Total

3- Jupiter – Decision power / Calmness / Reduce StressAchieve through 2 and 1

Month

6 – Venus – Beauty of Mind and Body – Related with various Yoga Aasans and Pranayaam

Date+Month

9 – Mars – overall strength/enthusiasm – What we achieve through Yoga

Vasumati Yog or Vasuman Yog

Vasumati Yog : – For Wealth  and Money in Vedic Astrology

Vasumati yog or Vasuman yog  brings enormous wealth in native’s life. Vasuman means wealthy and this yog  can be called as wealth producing yog.

Vasuman yog has been formed if all benefic planets are placed in 3rd,6th,10th or 11th house (Upchaya Houses) from Ascendant.  (It is not required that one is in 3rd or 6th or 10th or 11th. — It is required that all planets are in Upchaya houses.)

The same is also possible, if all benefic planets (Mercury, Venus, Jupiter) are placed in 3rd, 6th, 10th or 11th sign (Upcahay Houses) from moon Ascendant. (It means all benefic planets are in 3rd, 6th, 10th or in 11th sign — even though some sign has one or many benefic planets).

If the native born in vasumati  yog , he always lives in his house and he has lots of money.In early days, belief is that if person is outside of country ( lives in different country ),he is facing trouble and if lives in his home (or country ), he is pleasure situation.

The native ,who has vasumati yog not only gets wealth but also has good reputation in society. The native born with vasumati yog has characteristics like sweet language, clerical strength, diplomatic ect. The native borns with Vasumati Yog will be courageous, will not shy away from responsibilities. The native will have lot of initiative to achieve something in life. The native will earn lot of money primarily because of his own efforts. Vasumati Yoga has more to do with money than with anything else.  The upachya houses are the ones  which gives materialistic gains, benefic  planets in upachyas houses bring these gains to the native.

Students of Vedic astrology generally read the Vasumati yog from lagan as well as moon. It is seen that Vasumati yog formed in reference to lagan or ascendant is more influential than the one formed with reference to the Moon. If the upachayas happen to be exaltation place of the planet, the yog becomes very powerful while the reverse takes place when the upachayas happen to be a debilitated place of that planet. If three benefic planets occupy three upachyas houses out of the four upachyas houses then it will be more stronger  yoga than a horoscope which has two benefices occupying two upachyas houses.

लत्ता चक्र ( लत्ता कोष्ठक)

लत्ता का मतलब ग्रह की लात।
कुछ हानिकर संवेदनशील अंक लत्ता चक्र की मदद से निर्धारित होते हैं।
लत्ता मतलब एक विशेष नक्षत्र पर स्थित ग्रह द्वारा एक विशेष नक्षत्र पर एक हानिकर प्रभाव होगा जो, विशेष ग्रह से एक खास दूरी पर है।
अभिजित नक्षत्र की गणना नहीं करते हुए अश्विनी नक्षत्र से लेकर रेवती नक्षत्र तक यह २७ नक्षत्र में स्थित ग्रहो जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे
विशेष नक्षत्र पर लत्ता प्रहार करते हैं।
जिस समय का गोचर फल विचार करना हो,  उस समय…
(१) सूर्य  जिस नक्षत्र में हो उससे १२ वाँ नक्षत्र।
(२) मंगल जिस नक्षत्र में हो उससे तृतीय नक्षत्र।
(३) बृहस्पति जिस नक्षत्र में हो उससे छठा नक्षत्र।
(४) शनि जिस नक्षत्र में हो उससे आठवां नक्षत्र।
(१) से (४) यह सब पुरोलत्ता कहलाती है। इनमें आगे की ओर गिनती की जाती हैं।
जैसे कि.. अश्विनी नक्षत्र में सूर्य हो तो उत्तरा फाल्गुनी में पुरोलत्ता होती है।
(५) शुक्र जिस नक्षत्र में हो उससे उल्टा गिनने से पांचवां नक्षत्र।
(६) बुध जिस नक्षत्र में हो उससे उल्टा गिनने से सातवाँ नक्षत्र।
(७) राहु जिसमें हो उससे उल्टा गिनने से नवाँ नक्षत्र। और
(८) चन्द्रमा जिसमें हो उससे उल्टा गिनने से बाईसवाँ नक्षत्र।
(५) से (८) यह पृष्ठ लत्ता कहलाती हैं। जैसे कि.. उल्टा गिनने से अभिप्राय यह है कि अश्विनी नक्षत्र में शुक्र हो तो शतभिषा में शुक्र की लता हुई।
संक्षिप्त में ऐसा कहा जाता है कि सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित है उससे १२ वाँ पर, मंगल ३ पर, बुध २२ वाँ पर, गुरु ६ ठाँ पर, शुक्र २४ वाँ पर, शनि ८ वाँ पर, राहु – केतु २० पर और चन्द्रमा ७ वे नक्षत्र पर लत्ता प्रहार यानि कि लात का प्रहार करते हैं।
जैसे कि अश्विनी नक्षत्र में सूर्यादि ग्रहो स्थित हो तो सूर्य उत्तरा फाल्गुनी पर, मंगल कृतिका पर, बुध श्रवण पर, बृहस्पति आद्रा पर, शुक्र शतभिषा पर, शनि पुष्य पर, राहु – केतु पूर्वषाढा पर और चन्द्रमा पुनर्वसु पर लत्ता प्रहार करते हैं।
यदि जन्म नक्षत्र पर लत्ता पडे़ तो व्यथा होती है।
यदि सूर्य की लत्ता (लात) हो तो सब प्रकार की अर्थ हानि। राहु या केतु की लत्ता (लात)  हो तो दुःख। बृहस्पति की लत्ता में मरण; बन्धु नाश और भय। शुक्र की लत्ता में कलह। बुध की लत्ता में स्थान हानि – अनर्थ। चन्द्र की लत्ता में महाहानि। यह भिन्न – भिन्न ग्रहों के लत्ता के फल मिलता हैं। एक ही ग्रह की लत्ता पड़े तो साधारण अशुभ फल होता है। किंतु यदि दो या अधिक अशुभ ग्रहों की लत्ता एक साथ पड़े तो अशुभता की बहुत वृद्धि हो जायेगी और जितनी अधिक ग्रहों की लत्ता एक साथ जन्म नक्षत्र पर पड़े तो उतना ही अधिक अशुभ फल होता हैं।