लत्ता चक्र ( लत्ता कोष्ठक)

लत्ता का मतलब ग्रह की लात।
कुछ हानिकर संवेदनशील अंक लत्ता चक्र की मदद से निर्धारित होते हैं।
लत्ता मतलब एक विशेष नक्षत्र पर स्थित ग्रह द्वारा एक विशेष नक्षत्र पर एक हानिकर प्रभाव होगा जो, विशेष ग्रह से एक खास दूरी पर है।
अभिजित नक्षत्र की गणना नहीं करते हुए अश्विनी नक्षत्र से लेकर रेवती नक्षत्र तक यह २७ नक्षत्र में स्थित ग्रहो जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे
विशेष नक्षत्र पर लत्ता प्रहार करते हैं।
जिस समय का गोचर फल विचार करना हो,  उस समय…
(१) सूर्य  जिस नक्षत्र में हो उससे १२ वाँ नक्षत्र।
(२) मंगल जिस नक्षत्र में हो उससे तृतीय नक्षत्र।
(३) बृहस्पति जिस नक्षत्र में हो उससे छठा नक्षत्र।
(४) शनि जिस नक्षत्र में हो उससे आठवां नक्षत्र।
(१) से (४) यह सब पुरोलत्ता कहलाती है। इनमें आगे की ओर गिनती की जाती हैं।
जैसे कि.. अश्विनी नक्षत्र में सूर्य हो तो उत्तरा फाल्गुनी में पुरोलत्ता होती है।
(५) शुक्र जिस नक्षत्र में हो उससे उल्टा गिनने से पांचवां नक्षत्र।
(६) बुध जिस नक्षत्र में हो उससे उल्टा गिनने से सातवाँ नक्षत्र।
(७) राहु जिसमें हो उससे उल्टा गिनने से नवाँ नक्षत्र। और
(८) चन्द्रमा जिसमें हो उससे उल्टा गिनने से बाईसवाँ नक्षत्र।
(५) से (८) यह पृष्ठ लत्ता कहलाती हैं। जैसे कि.. उल्टा गिनने से अभिप्राय यह है कि अश्विनी नक्षत्र में शुक्र हो तो शतभिषा में शुक्र की लता हुई।
संक्षिप्त में ऐसा कहा जाता है कि सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित है उससे १२ वाँ पर, मंगल ३ पर, बुध २२ वाँ पर, गुरु ६ ठाँ पर, शुक्र २४ वाँ पर, शनि ८ वाँ पर, राहु – केतु २० पर और चन्द्रमा ७ वे नक्षत्र पर लत्ता प्रहार यानि कि लात का प्रहार करते हैं।
जैसे कि अश्विनी नक्षत्र में सूर्यादि ग्रहो स्थित हो तो सूर्य उत्तरा फाल्गुनी पर, मंगल कृतिका पर, बुध श्रवण पर, बृहस्पति आद्रा पर, शुक्र शतभिषा पर, शनि पुष्य पर, राहु – केतु पूर्वषाढा पर और चन्द्रमा पुनर्वसु पर लत्ता प्रहार करते हैं।
यदि जन्म नक्षत्र पर लत्ता पडे़ तो व्यथा होती है।
यदि सूर्य की लत्ता (लात) हो तो सब प्रकार की अर्थ हानि। राहु या केतु की लत्ता (लात)  हो तो दुःख। बृहस्पति की लत्ता में मरण; बन्धु नाश और भय। शुक्र की लत्ता में कलह। बुध की लत्ता में स्थान हानि – अनर्थ। चन्द्र की लत्ता में महाहानि। यह भिन्न – भिन्न ग्रहों के लत्ता के फल मिलता हैं। एक ही ग्रह की लत्ता पड़े तो साधारण अशुभ फल होता है। किंतु यदि दो या अधिक अशुभ ग्रहों की लत्ता एक साथ पड़े तो अशुभता की बहुत वृद्धि हो जायेगी और जितनी अधिक ग्रहों की लत्ता एक साथ जन्म नक्षत्र पर पड़े तो उतना ही अधिक अशुभ फल होता हैं।

Advertisements